अगर आपके बच्चे का वज़न उम्मीद के मुताबिक़ नहीं बढ़ रहा, तो इसका मतलब यह नहीं कि आपने कुछ ग़लत किया है। डॉक्टर ग्रोथ चार्ट पर कई हफ़्तों का पैटर्न देखती हैं, एक तौल नहीं। ज़्यादातर वजहें आम और सुलझने वाली होती हैं, जैसे दूध पिलाने की तकनीक या सप्लाई। जाँच के बाद आगे की योजना आपकी अपनी डॉक्टर बनाएँगी।
अगर आप यह पन्ना क्लिनिक, आँगनवाड़ी या टीके वाली मुलाक़ात से लौटने के कुछ ही घंटों के भीतर पढ़ रहे हैं, तो शायद आपके अंदर सब कुछ काँप रहा है। यह डर बिल्कुल जायज़ है। यहाँ आपको झूठी तसल्ली नहीं मिलेगी, सिर्फ़ यह साफ़-साफ़ बताया जाएगा कि इस बात का असल में मतलब क्या होता है, आगे क्या होता है, और इन दिनों में आपको क्या करना है और क्या बिल्कुल नहीं।
आप जो शब्द सुनेंगे, और वे क्या नहीं हैं
डॉक्टर के पर्चे पर या बातचीत में आपको तीन तरह की बातें मिल सकती हैं। "वज़न धीरे बढ़ रहा है", यानी slow weight gain। "ग्रोथ फ़ॉल्टरिंग", यानी growth faltering, जिसका मतलब है कि बढ़त की रफ़्तार लड़खड़ा रही है। और कभी-कभी एक पुराना अंग्रेज़ी शब्द, failure to thrive, जिसे हिंदी में लोग "बच्चा पनप नहीं रहा" कह देते हैं।
आख़िरी शब्द को आजकल बहुत से डॉक्टर जान-बूझकर इस्तेमाल नहीं करते, और इसकी वजह अच्छी है। उसमें "failure" शब्द है, जो सुनने में इल्ज़ाम जैसा लगता है, जैसे बच्चा या माँ-बाप किसी इम्तिहान में फ़ेल हो गए हों। असल में यह ऐसा कुछ भी नहीं है।
ये तीनों शब्द एक ही चीज़ की तरफ़ इशारा करते हैं: चार्ट पर बना एक पैटर्न, जिसे देखा जाना चाहिए। यह किसी बीमारी का नाम नहीं है, कोई नतीजा नहीं है, और आपकी परवरिश पर कोई फ़ैसला तो बिल्कुल भी नहीं है। इसका मतलब सिर्फ़ इतना है कि आगे जाँच होनी चाहिए।
पर्सेंटाइल या चार्ट की रेखा एक तुलना है, नंबर नहीं। नीचे की रेखा पर चलने का मतलब "ख़राब" और ऊपर की रेखा का मतलब "अच्छा" नहीं होता। यह सिर्फ़ बताता है कि इसी उम्र के बाक़ी बच्चों के मुक़ाबले आपका बच्चा कहाँ बैठता है। कोई भी वेबसाइट यह नहीं कह सकती कि आपका बच्चा स्वस्थ है या नहीं। यह सिर्फ़ आपकी अपनी डॉक्टर कह सकती हैं, जो पूरे बच्चे को सामने देखकर परखती हैं।
"वज़न ठीक से नहीं बढ़ रहा" गिना कैसे जाता है
MCP कार्ड (मदर एंड चाइल्ड प्रोटेक्शन कार्ड, कई राज्यों में इसे ममता कार्ड या माता-शिशु कार्ड भी कहते हैं) में उम्र के हिसाब से वज़न का ग्राफ़ बना होता है, जिस पर कई रेखाएँ खिंची रहती हैं। हर टीके पर, हर वज़न-दिवस पर या हर मुलाक़ात पर बच्चे का वज़न उस पर एक बिंदु की तरह लगाया जाता है। असली जानकारी किसी एक बिंदु में नहीं होती, बल्कि उन बिंदुओं से बनने वाली लाइन में होती है।
आम तौर पर डॉक्टर इन तीन बातों को गंभीरता से लेती हैं:
- वज़न की लाइन का लगातार, कई हफ़्तों तक नीचे की ओर जाते हुए दो या उससे ज़्यादा मुख्य रेखाएँ पार कर जाना।
- वज़न का हफ़्तों तक जहाँ का तहाँ रुक जाना, जबकि उस उम्र में बढ़त की उम्मीद हो।
- जन्म के लगभग दो से तीन हफ़्ते तक बच्चे का जन्म-वज़न वापस न आ पाना। शुरू के दिनों में थोड़ा वज़न घटना अपने आप में सामान्य है।
एक अकेली तौल इनमें से कुछ नहीं है। कपड़े, गीला डायपर, तौल का समय, दूध पिलाने से ठीक पहले या ठीक बाद तौलना, बच्चे का रोना-हिलना, और तराज़ू का अलग होना, ये सब मिलकर एक ही दिन में अलग-अलग नतीजे दे सकते हैं। इसीलिए एक कम नंबर देखकर डॉक्टर घबराती नहीं, वे दोबारा बुलाती हैं।
चार्ट की ये रेखाएँ असल में कहती क्या हैं और उन्हें पढ़ा कैसे जाता है, यह हमने अलग से समझाया है: ग्रोथ चार्ट और पर्सेंटाइल कैसे पढ़ें।
धीमे वज़न बढ़ने की आम वजहें
ऐसी ख़बर सुनते ही दिमाग़ सीधे सबसे डरावनी वजह पर चला जाता है। हक़ीक़त यह है कि सबसे आम वजहें रोज़मर्रा की होती हैं, और उनमें से ज़्यादातर का हल निकल आता है।
- दूध पिलाने की तकनीक: लैच यानी बच्चे का निप्पल और उसके आस-पास के हिस्से को मुँह में सही तरह पकड़ना, या गोद में पकड़ने की पोज़िशन। ऊपर से देखने पर लगता है कि बच्चा चूस रहा है, पर दूध उतना नहीं जा रहा होता।
- दूध की मात्रा कम होना या कुछ समय के लिए घट जाना: माँ की बीमारी, दर्द, तनाव, नींद की कमी, फ़ीड के बीच लंबे अंतराल, या काम पर वापस लौटना, इन सबसे सप्लाई कुछ हफ़्तों के लिए गिर सकती है।
- जल्दी थक जाने वाला बच्चा: कुछ बच्चे स्तन से लगते ही सो जाते हैं और पूरा दूध लिए बिना छोड़ देते हैं। समय से पहले जन्मे या पीलिया वाले बच्चों में यह और आम है।
- टंग-टाई: जीभ के नीचे की झिल्ली का ज़्यादा कसा होना, जिससे बच्चा ठीक से पकड़ और खींच नहीं पाता।
- रिफ़्लक्स: दूध का बार-बार वापस ऊपर आना, जिससे बच्चा बेचैन हो और पीने से कतराने लगे।
- गाय के दूध के प्रोटीन से एलर्जी: इसे CMPA कहते हैं। अक्सर इसके साथ उल्टी, पेट का दर्द, चिपचिपा या खून वाला मल, त्वचा पर दाने और लगातार रोना भी दिखता है।
- बार-बार होने वाले संक्रमण: सर्दी-ज़ुकाम, दस्त, कान या पेशाब की नली का इन्फ़ेक्शन। हर बीमारी में कुछ दिन के लिए भूख और वज़न दोनों गिर सकते हैं, और बार-बार बीमार पड़ने पर लाइन सपाट दिखने लगती है।
- बच्चा जो हमेशा से छोटा है: कुछ बच्चे शुरू से चार्ट की निचली रेखाओं के साथ-साथ चलते हैं और उसी रफ़्तार से बढ़ते रहते हैं। लाइन का नीचे होना अपने आप में समस्या नहीं है, लाइन का अपना रास्ता छोड़ देना अहम है।
थोड़े बड़े बच्चों में एक और आम वजह होती है: ऊपरी आहार की शुरुआत। जब बच्चा दलिया, खिचड़ी, दाल या मसली हुई सब्ज़ी लेने लगता है, तो कुछ हफ़्तों तक दूध कम पी सकता है, और उस दौरान वज़न की रफ़्तार धीमी दिख सकती है। यह अक्सर अपने आप संभल जाता है, फिर भी डॉक्टर को बताइए, ताकि वे पूरी तस्वीर देखकर तय कर सकें।
डॉक्टर या नर्स असल में क्या-क्या देखेंगी
अगर आपको दोबारा बुलाया गया है, तो वह मुलाक़ात कोई फ़ैसला सुनाने के लिए नहीं होती, जानकारी इकट्ठा करने के लिए होती है। आम तौर पर उसमें ये चीज़ें शामिल होती हैं:
- सही और जाँचे हुए तराज़ू पर तौल, छोटे बच्चे को बिना कपड़ों के, और हो सके तो हर बार वही तराज़ू।
- दूध पिलाने का पूरा ब्योरा: दिन-रात में कितनी बार, हर बार कितनी देर, एक स्तन या दोनों, बोतल हो तो कितनी बार और कितनी मात्रा।
- अक्सर आपके सामने ही एक फ़ीड देखना, क्योंकि लैच, निगलने की आवाज़ और बच्चे का रवैया बताकर समझाना मुश्किल है, देखकर समझना आसान।
- चौबीस घंटे में गीले और गंदे डायपर की गिनती, उनका रंग और बनावट।
- बच्चे की पूरी जाँच: मुँह और जीभ, पेट, दिल की आवाज़, साँस, त्वचा और मांसपेशियों का कसाव।
- वज़न के साथ लंबाई और सिर का घेरा भी नापना, और तीनों को एक साथ चार्ट पर देखना। अकेला वज़न अधूरी कहानी कहता है।
- ज़रूरत लगने पर खून या पेशाब की जाँच, और बाल रोग विशेषज्ञ, स्तनपान सलाहकार या ज़िले के पोषण केंद्र तक रेफ़र करना।
मुलाक़ात पर MCP कार्ड या ममता कार्ड ज़रूर साथ ले जाइए, चाहे आप निजी डॉक्टर के पास ही क्यों न जा रहे हों। पिछली सारी तौल एक ही जगह देख पाना डॉक्टर के लिए सबसे क़ीमती चीज़ है। साथ में यह भी लिख ले जाइए कि पिछले दो-तीन दिन में बच्चे ने कब-कब दूध पिया, कितनी देर, और कितने डायपर गीले हुए।
आगे क्या मदद करता है, और फ़ैसला कौन करेगा
यह पन्ना आपको जान-बूझकर कोई फ़ीडिंग प्लान नहीं देगा, और यही इसकी सबसे ज़रूरी बात है। दूध की मात्रा, ऊपर का दूध, टॉप-अप, फ़ॉर्मूला, ऊपरी आहार का समय, इनमें से किसी भी चीज़ का फ़ैसला वही इंसान कर सकता है जिसने आपके बच्चे को देखा है, उसका वज़न ख़ुद तौला है और उसका पूरा इतिहास जानता है।
बिना सलाह के दूध पिलाने का तरीक़ा बदलना हालात बेहतर करने के बजाय बिगाड़ सकता है। जल्दबाज़ी में ऊपर का दूध शुरू करने से माँ का अपना दूध और घट सकता है, और जिस असली वजह की जाँच होनी थी वह छिप जाती है।
एक बात बहुत साफ़ कहनी है। बोतल या कटोरी के दूध में सेरेलैक, दलिया, चीनी, शहद, घी मिलाना, या फ़ॉर्मूला के डिब्बे पर लिखी मात्रा से ज़्यादा पाउडर डालकर दूध "गाढ़ा" करना असल में ख़तरनाक है। इससे बच्चे की किडनी पर बोझ पड़ सकता है, दस्त या पानी की कमी हो सकती है, और दम घुटने का ख़तरा भी रहता है। ऐसा कोई भी क़दम सिर्फ़ तभी लिया जा सकता है जब आपकी अपनी डॉक्टर ने ख़ुद, आपके बच्चे के लिए, साफ़ निर्देश दिया हो।
जब वजह पकड़ में आ जाती है, तो आगे का रास्ता अक्सर सीधा होता है: दूध पिलाने में सहयोग और सही तकनीक, कुछ हफ़्तों तक तय अंतराल पर दोबारा तौल, अगर कोई बीमारी या एलर्जी निकली तो उसका इलाज, और ज़रूरत हो तो किसी विशेषज्ञ की राय। यह सब आपकी टीम का काम है, आपका काम सिर्फ़ बच्चे के पास रहना और मुलाक़ातों पर पहुँचना है।
इंतज़ार के दिनों में क्या न करें
अगली मुलाक़ात तक का इंतज़ार सबसे मुश्किल हिस्सा होता है। इन दिनों में कुछ चीज़ें आपको जानकारी नहीं, सिर्फ़ घबराहट देती हैं।
- घर पर रोज़ वज़न न करें। रोज़ का वज़न असली बढ़त नहीं दिखाता, सिर्फ़ शोर दिखाता है। एक दिन कम, अगले दिन ज़्यादा, और आप पूरे दिन उसी नंबर के बारे में सोचती रहेंगी। वज़न कितने अंतराल पर करना है, यह आपकी डॉक्टर तय करेंगी।
- तराज़ू बदल-बदलकर न तौलें। मेडिकल स्टोर, पड़ोसी, आँगनवाड़ी और घर का तराज़ू अलग-अलग नतीजे देंगे, और उनकी आपस में तुलना बेमानी है।
- दूसरे बच्चों से तुलना न करें। न रिश्तेदार के बच्चे से, न अपने ही बड़े बच्चे से। हर बच्चा अपना रास्ता ख़ुद बनाता है, और वही रास्ता मायने रखता है।
- अपराधबोध में स्तनपान बंद न करें। यह लगभग हमेशा जल्दबाज़ी में लिया गया फ़ैसला होता है, और इसे वापस लेना आसान नहीं होता। अगर बदलाव करना ही है, तो डॉक्टर या स्तनपान सलाहकार के साथ करें।
- अपने आप को दोष न दें। ऊपर गिनाई गई ज़्यादातर वजहों का आपके किए-धरे से कोई लेना-देना नहीं है। आप अपने बच्चे को क्लिनिक तक लाईं और सवाल पूछे, यही सबसे बड़ी बात है।
हर तौल एक जगह, ताकि लाइन दिखे
BabyMind में आप बच्चे का वज़न, लंबाई और सिर का घेरा दर्ज कर सकते हैं और समय के साथ बनने वाला रुझान देख सकते हैं, ताकि अगली मुलाक़ात में आपके पास याददाश्त नहीं, रिकॉर्ड हो। यह WHO के आधिकारिक पर्सेंटाइल कर्व नहीं बनाता, कोई निदान नहीं करता, और क्लिनिक की तौल की जगह नहीं लेता।
BabyMind डाउनलोड करेंकब उसी दिन डॉक्टर के पास जाएँ
धीमे वज़न बढ़ने की जाँच आम तौर पर इत्मीनान से होती है। लेकिन इनमें से कुछ भी दिखे तो इंतज़ार मत कीजिए, उसी दिन डॉक्टर को दिखाइए या नज़दीकी अस्पताल जाइए:
- डायपर बिल्कुल गीले न होना, या पहले से बहुत कम गीले होना।
- बच्चे का जागना मुश्किल होना, या शरीर का ढीला और लुंज-पुंज लगना।
- दूध पीने से लगातार इनकार करना, या हर फ़ीड के बाद पूरी उल्टी कर देना।
- छोटे बच्चे को बुख़ार आना, ख़ासकर तीन महीने से कम उम्र में।
- साँस तेज़ चलना, साँस लेते समय पसलियाँ धँसना, या घरघराहट।
- आपका ख़ुद का यह एहसास कि कुछ गंभीर रूप से ठीक नहीं है। माँ-बाप का यह एहसास अक्सर सही निकलता है, और उसे बताने में झिझकिए मत।
आख़िर में एक बात याद रखिए। "वज़न नहीं बढ़ रहा" एक सवाल है, जवाब नहीं। सवाल पूछा जा चुका है, और अब उसका पीछा करने वाले लोग आपके साथ हैं। आपको अकेले इसका हल नहीं निकालना है, बस अगली मुलाक़ात तक अपने बच्चे के पास बने रहना है।